हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, सुश्री करम ख़ज़ाई ने रोज़-ए-अरफ़ा को इस्लामी इतिहास का एक बहुत ही फज़ीलत भरा दिन क़रार देते हुए कहा है कि यह दिन तौबा, दुआ और अल्लाह के क़रीब होने का एक अनमोल मौका फराहम करता है।
उन्होंने हदीसों में रोज़-ए-अरफ़ा को मग़फ़िरत (बख़्शिश) और दुआ की क़बूलियत के दिन के तौर पर याद किया गया है, और यह रहमत के दरवाज़े खुलने का दिन है।
उन्होंने मासूमीन अ.स. की सीरत में रोज़-ए-अरफ़ा की अहमियत पर रौशनी डालते हुए बताया कि इस दिन इंसान अपने गुनाहों की माफ़ी अल्लाह से मांग सकता है और दुआ की क़बूलियत के सबसे क़रीब होता है।
मोहतरमा ख़ज़ाई ने अरफ़ा के आमाल का ज़िक्र करते हुए ग़ुस्ल ज़ियारत-ए-सय्यदुश्शोहदा (इमाम हुसैन अ.स.), दो रकअत नमाज़ और रोज़ा रखने को इस दिन के अहम आमाल में शामिल बताया। उनका कहना था कि ये आमाल इंसान को रूहानी तौर पर पाक बनाते हैं और अल्लाह के क़रीब ले जाते हैं।
उन्होंने मनासिक ए-हज में वकूफ़-ए-अरफ़ात को हज का दिल क़रार दिया और कहा कि इसके बिना हज मुकम्मल नहीं होता। हाजी इस दिन अरफ़ात के मैदान में दुआ और मुनाजात (गुहार) में मसरूफ़ रहते हैं।
उन्होंने गैर हाजियों को भी इस दिन की बरकतों से फायदा उठाने की दावत दी और कहा कि अरफ़ा सिर्फ हाजियों का दिन नहीं है, बल्कि हर मोमिन के लिए अल्लाह की तरफ़ रुजू का दिन है।
दुआ ए अरफ़ा का ज़िक्र करते हुए, जो इमाम हुसैन अ.स. से मंसूब है, उन्होंने इसे इरफ़ानी समाजी और आध्यात्मिक मआनी से भरपूर दुआ बताया और कहा कि यह दुआ अल्लाह की पहचान, तौहीद, इंसाफ़, सहयोग और बंदों में हम-आहंगी का पैग़ाम देती है।
आख़िर में उन्होंने कहा,रोज़-ए-अरफ़ा को ज़ाया न करें, दुआ-ए-अरफ़ा में गहराई से सोचें और अल्लाह की मारिफ़त हासिल करने की कोशिश करें, यह दिन आपकी ज़िंदगी की राह बदल सकता है।
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